आखिर! मैं ऐसा क्या करूँ??

 












By looking at the above figure I just have to say one line....

"You may call it love, but I call it LUST."

Below is the poem describing the helplessness of a girl because...

आखिर! मैं ऐसा क्या करूँ??

मैं ऐसा क्या पहनलूँ कि मेरा आँचल दाग से बचा रहे?

मैं ऐसा कौन सा इत्र लगाऊँ कि मेरी खुशबू तुम तक न पहुँचे ?

मैं ऐसी कौन सी राह से निकलूँ कि तुम्हारी नज़र मुझ पर न पड़े ?

मैं ऐसी कौन सी चाल अपनालूँ कि तुम्हे वो लुभाना न लगे?

मैं कितने दबे पाँव चलूँ कि तुम्हे मेरी आहट न हो?

मैं ऐसा कौन सा मुखौटा लगालूँ कि तुम मेरा हँसता हुआ चेहरा न देख सको?

मैं ऐसा कौन सा रंग डाललूँ कि मैं तुम्हें दिखाई न दूँ?

पर इस बेजान जिस्म का, मैं क्या करूँ ? जो तुम्हें लजीज़ लगता है!

ये तो कुदरत की देन है ,आखिर! कितना छिपाऊँ मैं इसे?

पर फिर भी तुम ढूंढ लेते हो अपनी हैवानियत दिखाने के लिए ।


सुना है बड़े -बड़े वायदे करते हो 

किसी को आसमान से तारे तोड़ने के,

तो किसी को जहन्नुम का....वाह!!

शुक्रगुजार हैं हम तुम्हारे....कि अपनी माँ, बहन, बेटी के रिश्तों का लिहाज तो करते हो,

वरना बाकि सब तो तुम्हे हवस मिटाने की चीज़ ही लगती हैं।

हैरानी तो मुझे इस बात पर होती है!!कि यहाँ तुम्हे मेरी जात, धर्म,  ईमान नहीं दिखाई देता ,

बस दिखता है तो वो लुभाने वाला शरीर....


मैं यहाँ खुश होऊँ या दुखी ?

कि अपना सुकून लेने के बाद तुम मुझे मुक्त कर देते हो इस ज़िन्दगी से ही,

क्योंकि तुम तो मेरे जिस्म को ही ठोकर मारते हो!

पर ये लोग तो मेरी रूह को भी छल्ली कर देते हैं ।

क्या खुश किस्मत हूँ मैं ?कि ये त्रासदी देखने के लिए मैं हूँ ही नहीं 

क्योंकि एक बार तो मैं अपने आप को सँभाल भी लेती,

पर अपने परिवार की नम आँखों का क्या करती?

या दुखी होऊँ ?

कि जिन परों ने अभी उड़ान भी नहीं भरी थी ,उन्हें तुमने अपनी हवस की आग से जला डाला।


कितना सुकून मिला होगा तुम्हें ,

कितनी रंगीन लगी होगी तुम्हें वो रात? हैंना...

और फिर भी तुम्हें चैन नहीं मिला!

अपनी गलती छिपाने के लिए भी तुमने मुझे ही बदनाम किया!!


क्या तुम्हारे लिए सिर्फ यही एक मज़ा है?

क्या कहूँ मैं घृणा सी आती है मुझे ,

और नफ़रत सी हो जाती है ,

क्यों होते हैं ये हादसे ?

सच में! विश्वास उठा सा देते हैं !


हाँ ...भले ही तुमने मुझे दर्दनाक मौत तो दी है,

पर दुआ होगी मेरी कि तुम्हे एक बेटी जरूर मिले,

और जब उसे देखो तो मेरा ही चेहरा दिखाई दे तुम्हें,

उस दिन देखूँगी... कि तुम क्या बहाना करते हो!


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